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क़ता


अपने घर से बाहर क्योंकर झाँकू अब

मेरे क़द से ऊँची हैं दीवारें सब

मैं भी सर को ऊँचा कर के चलता था

मेरे पांवों के नीचे धरती थी जब


प्रस्तुति : अलबेला खत्री






काव्य रसिक मित्रो !

नमस्कार !


मुझे खेद है कि अति व्यस्तता के चलते मैं इस महफ़िल--अदब

की ख़िदमत नहीं कर पा रहा था और कवि सम्मेलन का यह दीप

बुझा बुझा सा था, परन्तु अब एक बार पुनः महफ़िल सजेगी

और यहाँ कविता की तूती बजेगी


अप सब को स्नेह आमन्त्रण है अगली पोस्ट के लिए............


धन्यवाद !


-अलबेला खत्री


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