9:26 AM -
Posted by Unknown -
कवि-सम्मेलन की धारा में आज प्रस्तुत हैं
पुणे निवासी नवोदित रचनाकार
दिलीप शर्मा की एक नन्ही सी कविता
औक़ात
तुम हवा थी, ठीक थी
तूफान बनने की
क्या ज़रूरत थी ?
मैं तिनका था, तुच्छ था
वैसे भी उड़ जाता
रचयिता : दिलीप शर्मा
प्रस्तुति : अलबेला खत्री
9:27 AM -
Posted by Unknown -
शिक्षक दिवस के अवसर पर आज कवि-सम्मेलन में
एक बार फिर पेश है सन्त कबीर !
गुरू धोबी सिष कापड़ा, साबुन सिरजनहार
सुरत सिला पर धोइये, निकसै रंग अपार
रचयिता : सन्त कबीर
प्रस्तुति : अलबेला खत्री
10:59 PM -
Posted by Unknown -
कवि-सम्मेलन में आज सन्त कबीर के कुछ व्यसन विरोधी दोहे :
कलिजुग काल पठाइया, भंग तमाल अफीम
ज्ञान ध्यान की सुधि नहीं, बसै इन्हीं की सीम
भांग तमाखू छूतरा, अफयूं और सराब
कह कबीर इनको तजै, तब पावे दीदार
औगुन कहूँ सराब का, ज्ञानवंत सुनि लेय
मानुष से पसुआ करे, द्रव्य गांठ को देय
अमल अहारी आत्मा, कबहूँ न पावै पारि
कहै कबीर पुकार कै, त्यागो ताहि बिचारि
मद तो बहुतक भान्ति का, ताहि न जानो कोय
तनमद मनमद जातिमद, मायामद सब लोय
रचयिता : सन्त कबीर
प्रस्तुति : अलबेला खत्री
4:06 AM -
Posted by Unknown -
कवि-सम्मेलन की महफ़िल में आज जन्माष्टमी की पूर्व संध्या पर प्रस्तुत है
अमेरिका निवासी कवयित्री भारती बी नानावटी की भक्ति रचना
जो मैंने डॉ सुधा धींगडा
सम्पादित "मेरा दावा है"
काव्य संकलन में बरसों पहले प्रकाशित की थी :
आओ कृष्ण आओ रे
आओ कृष्ण आओ रे
रह ताकते भक्त हृदयों में
आनन्द-पुष्प खिलाओ रे
माया नर्तकी नाच रही है
कीर्तन-धुनी कराओ रे
त्रिगुण मुक्त प्रकृति आपकी
'मैं' और 'मेरी' छुड़ाओ रे
अन्धकार अज्ञान का छाया
ज्ञानदीप प्रगटाओ रे
प्रभु ! आपकी अनुकम्पा का
माधुर्य छलकाओ रे
अभिलाषा यह पूरी कर दो
दिव्य-रूप दर्शाओ रे
आओ कृष्ण आओ रे
आओ कृष्ण आओ रे
रचयिता : भारती बी. नानावटी
प्रस्तुति : अलबेला खत्री
9:00 PM -
Posted by Unknown -
सोचिये, किनके इशारों पर प्रभाती गा रही है
ये हवा जो सामने से सर उठा कर आ रही है
मैं इसी आबो-हवा का रुख बदलना चाहता हूँ
रोज़ जिसमें सभ्यता की नथ उतारी जा रही है
देखिएगा उन घरों को, टूट कर बिखरे हुए हैं
एकता जिन-जिन घरों में, एकताएं ला रही हैं
आप जिन रंगीनियों की सोच में डूबे हुए हैं
वो हमारी नस्ल की खुद्दारियों को खा रही है
मैं नशेमन में अकेला बैठ कर ये सोचता हूँ
ये हवा इस अंजुमन को क्यूँ नवाज़ी जा रही है
रचयिता : तेजनारायण शर्मा 'बेचैन'
प्रस्तुति : अलबेला खत्री
3:32 AM -
Posted by Unknown -
कवि-सम्मेलन की इस रंगारंग महफ़िल के नये चरण का श्री गणेश
करने के लिए आज हमारे बीच उपस्थित हैं मंच और साहित्य में
समान रूप से ख्यातनाम कवि-ग़ज़लकार श्री तेजनारायण शर्मा
'बेचैन' जिनकी ग़ज़लों के संकलन "कुछ पल जीते - कुछ पल हारे"
से आभार सहित ये ग़ज़ल मैं आप तक पहुंचा रहा हूँ .
आशा है आप सब को पसन्द आएगी .
बात - बात में बात बनानी, जिनको कोरी आती है
उनके ही सपनों में अक्सर, भरी तिजोरी आती है
वे पतितों के पूज्यपाद हैं, धनिकों के धनधान्य गुरू
श्मशानों के सिद्धचक्र हैं, उन्हें अघोरी आती है
रूपनिखारों से रूपों के रूपक नहीं बदलते हैं
छलियों की छवि दर्पण में, हर ओर छिछोरी आती है
नटवर नागर केशव के सब योग निरर्थक हो जाते
जब-जब कुञ्ज-कछारों में वृषभानु किशोरी आती है
क्या लिखता था दद्दू अपना, दीन-हीन की व्यथा कथा
प्रेमचंद की याद बहुरिया, हमको होरी आती है
रचयिता : तेजनारायण शर्मा 'बेचैन'
प्रस्तुति : अलबेला खत्री
7:59 AM -
Posted by Unknown -
काव्य रसिक मित्रो !
नमस्कार !
मुझे खेद है कि अति व्यस्तता के चलते मैं इस महफ़िल-ए-अदब
की ख़िदमत नहीं कर पा रहा था और कवि सम्मेलन का यह दीप
बुझा बुझा सा था, परन्तु अब एक बार पुनः महफ़िल सजेगी
और यहाँ कविता की तूती बजेगी ।
अप सब को स्नेह आमन्त्रण है अगली पोस्ट के लिए............
धन्यवाद !
-अलबेला खत्री
www.albelakhatri.com