ताज़ा टिप्पणियां

विजेट आपके ब्लॉग पर



राज़े-हस्ती राज़ है जब तक कोई महरम न हो


खुल गया जिस दम तो मरहम के सिवा कुछ भी नहीं




तेरे आज़ाद बन्दों की न ये दुनिया न वो दुनिया


यहाँ मरने की पाबन्दी, वहां जीने की पाबन्दी




मुझे रोकेगा तू ऐ नाखुदा क्या ग़र्क होने से


कि जिनको डूबना हो, डूब जाते हैं सफ़ीने में



रचयिता : इकबाल

प्रस्तुति : अलबेला खत्री





This entry was posted on 10:42 PM and is filed under . You can follow any responses to this entry through the RSS 2.0 feed. You can leave a response, or trackback from your own site.

3 comments:

    Kulwant Happy said...

    इकबाल साहिब की तरह अगर दुनिया का हर व्यक्ति इकबाल-ए-जुर्म कर ले। शायद दुनिया से हसीं न होगी जन्नत अलबेला जी... मिलेगा का हर नुक्कड़ हासा, ठहाका और खुशियों का मेला जी... न लगेगा कोई पैसा थेला जी...आप गुरू और मैं चेला जी...

    एनडी तिवारी के नाम खुला

  1. ... on December 26, 2009 at 11:43 PM  
  2. डॉ टी एस दराल said...

    वाह , वाह, बहुत खूब।
    शायद किसी ओर इशारा कर रहे हैं।

  3. ... on December 27, 2009 at 1:52 AM  
  4. Udan Tashtari said...

    धन्यवाद इन्हें पेश करने का.

  5. ... on December 27, 2009 at 12:39 PM