ताज़ा टिप्पणियां

विजेट आपके ब्लॉग पर



धन का दरोगा चाहे कितना सताये हमें,

प्रण है शहीदों की क़सम नहीं बेचेंगे


सुविधा की समिधा से यज्ञ न करेंगे कभी,

दुविधा को अपना जनम नहीं बेचेंगे


लोगों ने तो नोंच नोंच खा ही लिया नियमों को,

लेखनी व आँख की शरम नहीं बेचेंगे


ज़िन्दा गड़वा दो चाहे गोलियों से भून ही दो,

कवि हैं कबीर की कलम नहीं बेचेंगे



रचयिता : डॉ सारस्वत मोहन 'मनीषी'

प्रस्तुति : अलबेला खत्री





This entry was posted on 8:33 AM and is filed under . You can follow any responses to this entry through the RSS 2.0 feed. You can leave a response, or trackback from your own site.

0 comments: