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कवि-सम्मेलन में आज एक मुक्तक मेरी पसन्द का ..........जिसे मैं

मंच संचालन में अवश्य प्रयोग करता हूँ चूँकि आज एक ऐतिहासिक

दिन है जब हमारे देश ने एक बड़े मुद्दे पर पारस्परिक नेह और

मोहब्बत का रुख अपना कर ये साबित कर दिया है कि अहिंसा और

धर्म की इस पावन भूमि में अब हिंसा और नफ़रत के लिए कोई जगह

नहीं..........



फूल की बातें करें, मकरन्द की बातें करें

गीत की बातें करें और छन्द की बातें करें

द्वेष ने बारूद पर बैठा दिया था आदमी

आइये अब अम्न और आनन्द की बातें करें



रचयिता : अज्ञात महापुरूष

प्रस्तुति : अलबेला खत्री





दिवंगत को परम शान्ति मिले

ओम शान्ति !





धन का दरोगा चाहे कितना सताये हमें,

प्रण है शहीदों की क़सम नहीं बेचेंगे


सुविधा की समिधा से यज्ञ करेंगे कभी,

दुविधा को अपना जनम नहीं बेचेंगे


लोगों ने तो नोंच नोंच खा ही लिया नियमों को,

लेखनी आँख की शरम नहीं बेचेंगे


ज़िन्दा गड़वा दो चाहे गोलियों से भून ही दो,

कवि हैं कबीर की कलम नहीं बेचेंगे



रचयिता : डॉ सारस्वत मोहन 'मनीषी'

प्रस्तुति : अलबेला खत्री








कवि सम्मेलन की धारा में

आज फिर एक मंचीय कवि और फ़िल्म गीतकार

वीनू महेन्द्र


मैं गीतकार हूँ

गीत लिखता हूँ

मंहगा लिखता हूँ

सस्ता बिकता हूँ

पर जब कोई चैक मिल जाता है

तो जब तक वो पास हो जाता है

बैंक के आसपास ही दिखता हूँ



रचयिता : वीनू महेन्द्र

प्रस्तुति : अलबेला खत्री









फिर से एक बार कबीर.....................



रात गंवाई सोय के, दिवस गंवाया खाय

हीरा जन्म अमोल-सा, कौड़ी बदले जाय



कबिरा तेरी झोपड़ी, गलकटियन के पास

करनगे सो भरनगे, तू क्यों भयो उदास



रचयिता : कबीर

प्रस्तुति : अलबेला खत्री







कवि - सम्मेलन में आज

हास्य सम्राट शैल चतुर्वेदी की एक ग़ज़ल.........



आयोजन लीलायें कितनी

चन्दे और सभायें कितनी


किसको फुर्सत है के सोचे

कवि कितने, कवितायें कितनी


बाहर चहल पहल कोलाहल

भीतर बन्द गुफ़ायें कितनी


सागर का तट छूते छूते

रीत गईं सरितायें कितनी


आंसू की भी क्या किस्मत है

बहने में बाधायें कितनी



रचयिता : शैल चतुर्वेदी

प्रस्तुति : अलबेला खत्री












आज प्रस्तुत है हास्य के हिमालय स्व शैल चतुर्वेदी की

एक लोकप्रिय हास्य कविता



नये -नये मन्त्री ने कहा- आज कार हम चलाएंगे

ड्राइवर बोला - हम उतर जायेंगे

हुज़ूर ! चला कर तो देखिये........

आपकी आत्मा हिल जाएगी

ये कार है, सरकार नहीं,

जो भगवान के भरोसे चल जायेगी



रचयिता : शैल चतुर्वेदी

प्रस्तुति : अलबेला खत्री