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कलम नहीं बेचेंगे


धन का दरोगा चाहे

कितना सताये, हमें

प्रण है शहीदों की क़सम नहीं बेचेंगे



सुविधा की समिधा से

यज्ञ न करेंगे कभी,

दुविधा को अपना जनम नहीं बेचेंगे



लोगों ने तो नियमों को

नोंच नोंच खा ही लिया,

लेखनी व आँख की शरम नहीं बेचेंगे



जेल में ही डालो, चाहे

गोलियों से भून
ही दो,

कवि हैं कबीर की कलम नहीं बेचेंगे


रचयिता : डॉ सारस्वत मोहन "मनीषी"

प्रस्तुति : अलबेला खत्री


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2 comments:

    विनोद कुमार पांडेय said...

    बेहद उम्दा सोच और उससे सजी खूबसूरत बात...यही हुंकार हर नागरिक का होना चाहिए...बढ़िया कविता..बधाई!!

  1. ... on November 1, 2009 at 1:00 AM  
  2. डॉ टी एस दराल said...

    कवि हैं कबीर की कलम नहीं बेचेंगे
    वाह, उत्तम विचार.
    साधुवाद

  3. ... on November 1, 2009 at 7:26 AM