ताज़ा टिप्पणियां

विजेट आपके ब्लॉग पर
शीन काफ़ निज़ाम के दोहे



ये कैसा इनआम है , ये कैसी सौगात


दिन देखे जुग होगए, जब जागूं तब रात




सांझ, सबेरा, रात, दिन, आंधी, बारिश, धूप


इन्द्र धनुष के सात रंग, उस के सौ सौ रूप




बुढ़िया चरखा कातती, हो गई क्या अनहूत


झपकी से झटका लगा , गया साँस का सूत




पतझड़ की रुत गयी, चलो आपने देस


चेहरा पीला पड़ गया , धोले हो गए केस



याद आई परदेस में, उसकी इक-इक बात


घर का दिन ही दिन मियाँ , घर की रात ही रात



वो सब की पहचान है, सब उसके अनुरूप


शाइर, शे' और शायरी, सभी शब्द के रूप



चौपालें चौपट हुईं, सहन में सोया सोग


अल्ला जाने क्या हुए, आल्हा गाते लोग



हम 'कबीर' कलिकाल के, खड़े हैं खाली हाथ


संग किसी के हम नहीं और हम सब के साथ



मन में धरती सी ललक, आँखों में आकाश


याद के आँगन में रहा, चेहरे का परकाश



शायर : शीन काफ़ निज़ाम

प्रस्तुति : अलबेला खत्री


This entry was posted on 11:24 PM and is filed under . You can follow any responses to this entry through the RSS 2.0 feed. You can leave a response, or trackback from your own site.

5 comments:

    ज़ाकिर अली ‘रजनीश’ said...

    इस महत्वपूर्ण साहित्य निधि को हमारे साथ बांटने का शुक्रिया।
    -Zakir Ali ‘Rajnish’
    { Secretary-TSALIIM & SBAI }

  1. ... on October 29, 2009 at 11:35 PM  
  2. BAD FAITH said...

    हम 'कबीर' कलिकाल के, खड़े हैं खाली हाथ


    संग किसी के हम नहीं और हम सब के साथ
    रोचक. बहुत अच्छे.

  3. ... on October 29, 2009 at 11:46 PM  
  4. डॉ टी एस दराल said...

    इतने अच्छे दोहे प्रस्तुत करने का आभार.
    पहले दोहे में इनाम की जगह इनआम शायद दोहे को तकनीकि रूप से शुद्ध करने के लिए है.
    दुसरे दोहे में अशुद्धता है.
    बहरहाल, सभी दोहे गज़ब के हैं. आभार

  5. ... on October 30, 2009 at 12:14 AM  
  6. जी.के. अवधिया said...

    आपके इस ब्लॉग से बहुत अच्छी रचनाएँ पढ़ने को मिल रही हैं। धन्यवाद!

    इन दोहों को पढ़ कर मुझे मीर तकी 'मीर' का यह दोहा याद आ गयाः

    बिरह आग तन में लगी जरन लगे सब गात।
    नारी छूअत बैद के पड़े फफोला हाथ॥

  7. ... on October 30, 2009 at 2:25 AM  
  8. योगेन्द्र मौदगिल said...

    ये ठीक काम किया खत्री जी....

  9. ... on October 30, 2009 at 2:53 AM