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फिर से एक बार कबीर.....................



रात गंवाई सोय के, दिवस गंवाया खाय

हीरा जन्म अमोल-सा, कौड़ी बदले जाय



कबिरा तेरी झोपड़ी, गलकटियन के पास

करनगे सो भरनगे, तू क्यों भयो उदास



रचयिता : कबीर

प्रस्तुति : अलबेला खत्री




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3 comments:

    Gagan Sharma, Kuchh Alag sa said...

    कहां संत कबीर और कहां हम। उनके कहने का गूढ अर्थ और है।
    पर सिर्फ शाब्दिक अर्थों को देखें तो बिना सोए या खाए जीवन बचता ही कहां है। :-)

  1. ... on September 19, 2010 at 8:29 PM  
  2. Shah Nawaz said...

    बेहतरीन दोहे हैं.......

  3. ... on September 19, 2010 at 9:08 PM  
  4. निर्मला कपिला said...

    सुन्दर सार्थक दोहे। शुभकामनायें

  5. ... on September 19, 2010 at 10:29 PM