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मैं उनका ही होता,


जिन में मैंने रूप-भाव पाये हैं



वे मेरे ही हिये बंधे हैं


जो मर्यादायें लाये हैं




मेरे शब्द,भाव उनके हैं,


मेरे पैर और पथ मेरा,


मेरा अंत और अथ मेरा,


ऐसे किन्तु चाव उनके हैं




मैं ऊँचा होता चलता हूँ


उनके ओछेपन से गिर-गिर,


उनके छिछलेपन से ख़ुद-ख़ुद,


मैं गहरा होता चलता हूँ




रचयिता : जानन. मा. मुक्तिबोध

प्रस्तुति : अलबेला खत्री .


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5 comments:

    मनोज कुमार said...

    गजानन. मा. मुक्तिबोध को श्रद्धा नमन।

  1. ... on November 13, 2009 at 10:39 AM  
  2. अर्कजेश said...

    ये काम काम का रहा । मुक्तिबोध की एक कविता पढवा दिए । धन्‍यवाद ।

  3. ... on November 13, 2009 at 10:58 AM  
  4. Udan Tashtari said...

    आभार इसे पढ़वाने का. मुक्तिबोध को श्रद्धा नमन।

  5. ... on November 13, 2009 at 5:25 PM  
  6. डॉ टी एस दराल said...

    आभार.

  7. ... on November 14, 2009 at 1:54 AM  
  8. शरद कोकास said...

    इस गहराई को पाना केवल मुक्तिबोध के लिये ही सम्भव है ..हम तो बस डूबते-उतराते रहते हैं ।

  9. ... on November 22, 2009 at 10:23 AM